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मैं बावनी इमली का पेड़ बोल रहा हूं

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बूढ़े इमली के पेड़ को याद है 168 साल पहले अंग्रेजों की बर्बरता

-इसी इमली पर फांसी पर लटका दिए गए थे बावन आजादी के दीवान

कानपुर।देश के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधा, अमर शहीद ठाकुर जोधा सिंह अटैया को उनके 51 क्रांतिकारी साथियों के साथ 28 अप्रैल सन् 1858 को जब अरगल के राजा साहब से मिलकर लौट रहे थे। ब्रिटिश हुकूमत के कर्नल क्रिसटाइल की घुड़सवार सेना ने मुखबिर की सूचना पर ‘घोराह गांव’ के पास घेर कर बन्दी बना लिया। इसके बाद बिन्दकी और खजुहा के बीच गांव के पास स्थित इमली के पेड़ पर सभी को फांसी पर लटका दिया था। उस समय बर्बरता और दहशत का ये आलम था कि किसी ने भी इन शवों को पेड़ से उतारने की हिमाकत नहीं की। इसके एक माह से भी अधिक बाद 3/4 जून 1858 की रात्रि को ठाकुर महाराज सिंह जी निवासी- पहुर ने उन शहदों के नरकंकालों को उतरवा कर उनका अंतिम संस्कार गंगा जी में कराया।

बिन्दकी तहसील के खजुहा के समीप इमली का यह पुराना बूढ़ा हरा- भरा दरख्त आज भी भारत माता के उन 52 सपूतों के बलिदान का साक्षी है जिनके आजादी की लड़ाई के योगदान को इस देश के इतिहास से कभी भुलाया नहीं जा सकता।बावनी इमली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बलिदान की जीवित निशानी है।यह हमें याद दिलाता है कि आजादी कितनी कठिन संघर्ष के बाद मिली है। और इसकी कीमत इतनी सस्ती नही है। जितनी आज हमें दिखाई देती है। प्रस्तुति-अभिनव

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